कल तक सवाल, आज साथ ताल कांग्रेस महासचिव गुरमीत सिंह मंगू की बदली चाल पर सियासी हलचल

 

सियासत की बिसात पर मोहरे कब किस खाने में खिसक जाएँ, कहना मुश्किल है। लेकिन जब कोई चेहरा, जो कल तक मंच से आग उगल रहा था, आज उसी मंच पर मुस्कुराते हुए ताली बजाता दिखे तो सवाल तो उठेंगे ही,,

 

शहर की राजनीति में इन दिनों कांग्रेस के महासचिव गुरमीत सिंह मंगू को लेकर चर्चाओं का बाज़ार गर्म है,,,

 

 कभी उपमुख्यमंत्री और भाजपा नेतृत्व पर तीखे बयान देने वाले मंगू हालिया कार्यक्रम में उपमुख्यमंत्री के ठीक बगल में खड़े नजर आए चेहरे पर मुस्कान, हाथों में ताली। तस्वीरों ने शब्दों से ज्यादा शोर मचा दिया,,,

 

राजनीतिक गलियारों में फुसफुसाहट है क्या यह महज शिष्टाचार था या इशारों में कोई नई पटकथा लिखी जा रही है,,

 

विपक्षी दल चुटकी ले रहे हैं कि “जो कल तक गूंजते थे विरोध में, आज वही स्वर समर्थन में क्यों नरम पड़ गए,,,

सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या कांग्रेस की स्थानीय सियासत में कोई नई रणनीति तैयार हो रही है, या फिर यह व्यक्तिगत राजनीतिक भविष्य की बिसात बिछाने की शुरुआत है,,

 

मंगू के करीबी इसे सामान्य राजनीतिक व्यवहार बता रहे हैं। उनका तर्क है कि लोकतंत्र में संवाद और मंच साझा करना गलत नहीं। लेकिन आलोचकों का कहना है कि बात केवल मंच की नहीं, संदेश की है राजनीति में तस्वीरें कभी-कभी बयान से ज्यादा असर छोड़ जाती हैं,,,

 

शहर के विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी मौसम नजदीक आते ही कई चेहरे अपने कदम तौलकर रखते हैं। ऐसे में हर सार्वजनिक उपस्थिति को राजनीतिक चश्मे से देखा जाना स्वाभाविक है,,,

 

अब बड़ा सवाल यह है क्या गुरमीत सिंह मंगू विचारों के पुल बना रहे हैं, या फिर सियासी रास्ता बदलने की तैयारी में हैं क्या यह रणनीतिक ‘सॉफ्ट कॉर्नर’ है या पार्टी की लाइन से अलग कोई निजी संकेत,,

 

सच क्या है, यह तो वक्त बताएगा,,

 

लेकिन फिलहाल रीवा की सियासत में एक तस्वीर कई सवाल छोड़ गई है और राजनीति में सवाल ही सबसे बड़े संकेत होते हैं,,,

 

रीवा की सियासत में नया राग गरबा से दूरी, शिव बारात में संगत गुरमीत मंगू के बदले सुरों पर सवाल,,,

 

रीवा की राजनीति में तस्वीरें कभी-कभी शब्दों से ज्यादा बोलती हैं। और जब तस्वीरों में सुर, संगत और सियासत एक साथ नजर आएं, तो सवाल उठना लाजिमी है,,,

 

कांग्रेस के महासचिव गुरमीत सिंह मंगू जो नवरात्रि में गरबा महोत्सव के आयोजक के रूप में मंच सजाते हैं,,,

 

उनके कार्यक्रम में उपमुख्यमंत्री राजेन्द्र शुक्ला की गैरमौजूदगी चर्चा का विषय बनती है। लेकिन तस्वीर तब बदल जाती है जब शिव बारात में वही गुरमीत मंगू, उपमुख्यमंत्री के ठीक बगल में भजन-कीर्तन करते, सड़कों पर साथ-साथ चलते दिखाई देते हैं,,,

 

ये सिर्फ धार्मिक आस्था है या सियासत की नई प्रस्तावना,,,

 

गरबा मंच से विपक्ष की राजनीति, और शिव बारात में सत्ता के साथ सुर मिलाना… यह विरोधाभास संयोग है या संकेत,,,

 

नवरात्रि के मंच पर जहां राजनीतिक दूरी साफ दिखती है, वहीं शिव बारात में कंधे से कंधा मिलाकर उपस्थिति कई तरह के कयासों को जन्म दे रही है। क्या यह व्यक्तिगत संबंधों की सहजता है या आने वाले दिनों की कोई सियासी पटकथा,,,

 

रीवा की गलियों में चर्चा गर्म है

क्या कांग्रेस के महासचिव के सुर बदल रहे हैं

या यह सिर्फ “धर्म की राजनीति” नहीं बल्कि “राजनीति का धर्म” हैऔर सबसे बड़ा सवाल,,,

 

जब उपमुख्यमंत्री पर विभिन्न मुद्दों पर सवाल उठते हैं, तब गुरमीत सिंह मंगू की चुप्पी क्यों गूंजती है,,,

तस्वीरें सामने हैं। वीडियो भी बोल रहे हैं अब जवाब सियासत को देना है,,,

रीवा देख रहा हैऔर राजनीति में हर कदम, हर संगत, एक संदेश छोड़ जाती है,,,

 

न्यूज़ सोर्स : भास्कर करोंद संदेश एडिटर-इन-चीफ अनिल की वाणी