✍️ लेखक: मारूफ अहमद खान 

नोएडा के युवराज मेहता की मौत किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह उस आम आदमी की कहानी है जो हर दिन इस भरोसे के साथ घर से निकलता है कि अगर हालात बिगड़े तो सिस्टम उसे बचाने आएगा। यह मौत सपनों की नहीं, उस भरोसे की मौत है जो शासन और प्रशासन के तंत्र पर टिका होता है। यह मामला न्याय या बाद की जांच और कार्यवाही से ज्यादा उस पल का है जब जान बचाई जा सकती थी। किसी हादसे के वक्त आम आदमी सबसे पहले राहत और बचाव एजेंसियों की तरफ देखता है। फायर ब्रिगेड, SDRF और NDRF से यह उम्मीद की जाती है कि वे तुरंत, समन्वय के साथ और पूरी तैयारी में पहुंचेंगी। युवराज मेहता के मामले में यही व्यवस्था फेल होती दिखी है। सवाल सीधा है। समय पर मदद क्यों नहीं पहुंची। क्या उपकरण नाकाफी थे?क्या टीमों के बीच तालमेल नहीं था? क्या मौके पर मौजूद एजेंसियां हालात के अनुरूप प्रशिक्षित नहीं थीं? इन सवालों के जवाब दिए बिना हर जांच और कार्यवाही अधूरी रहेगी। और इससे भी बड़ा सवाल जवाबदेही का है। जब सिस्टम फेल होता है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। लेकिन यहां कार्रवाई की बजाय चुप्पी ज्यादा नजर आती है। नोएडा की डीएम को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कहा जा रहा है कि उनके खिलाफ ठोस कार्रवाई इसलिए नहीं हो रही क्योंकि वे देश के मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी हैं। अगर यह धारणा भी लोगों के मन में बैठ रही है तो यह अपने आप में सिस्टम की साख के लिए खतरनाक है। किसी अधिकारी की पारिवारिक पहचान अगर जवाबदेही से बड़ी हो जाए तो आम आदमी का भरोसा टूटना तय है। जनता यह महसूस करने लगती है कि नियम और सख्ती सिर्फ कमजोर लोगों के लिए हैं। ताकतवर पदों पर बैठे लोगों के लिए नहीं। यह घटना बताती है कि समस्या सिर्फ एक हादसे की नहीं है। समस्या उस पूरी संरचना की है जो कागजों में मजबूत और जमीन पर कमजोर है। जहां मॉक ड्रिल होती हैं, योजनाएं बनती हैं, बजट पास होते हैं लेकिन असली वक्त पर सिस्टम हांफने लगता है। युवराज मेहता आज एक नाम है। कल कोई और होगा। फर्क बस इतना होगा कि खबर की हेडलाइन बदल जाएगी। लेकिन अगर राहत और बचाव व्यवस्था की नाकामी पर ईमानदारी से सवाल नहीं उठे, अगर पद और पहचान के आधार पर कार्रवाई टलती रही, तो हर आम आदमी खुद को अकेला और असुरक्षित महसूस करता रहेगा। युवराज की मौत हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या इस देश में आपात स्थिति में आम आदमी को बचाने की व्यवस्था सच में तैयार है। अगर जवाब नहीं है, तो यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता है।

न्यूज़ सोर्स : मनीष राजू संवाददाता मध्य प्रदेश