खान आशु 

भोपाल। माह ए रमजान के दूसरे अशरे की भी बिदाई का समय नजदीक आ गया है। अकीदतमंद रोजा, नमाज, तरावीह और तिलावत में मशगूल हैं। मातापिता और परिवार की इन गतिविधियों का असर छोटे बच्चों पर भी पड़ रहा है। जहां वे परिवार की महिलाओं के साथ घर में तो कभी और घर के मर्दों के साथ मस्जिद तक जाकर नमाज की अदायगी में शिरकत कर रहे हैं, वहीं सबको देखते हुए उनमें भी रोजा रखने का जज्बा पैदा हो रहा है। उम्र के छोटे और जिद के पक्के इन बच्चों की रोजा रखने की मांग गहराती जा रही है।

उम्र के कच्चे, बातों के पक्के इबाद जफर 7 साल के होकर पहली जमात में पढ़ाई कर रहे हैं। हर सेहरी में अम्मी एमन और पापा तनवीर जफर के साथी होते हैं। इफ्तार का दस्तरख्वान और नमाज के लिए जानमाज बिछाने में इनकी अग्रणी भूमिका होती है। फिलहाल एक्जाम चल रहे हैं, लेकिन इसके खत्म होते ही रोजा रखने की इबाद जफर की जिद है। इसके लिए बकायदा समय समय पर अम्मा को वह याद भी दिलाते रहते हैं और इसके लिए उनसे वादा भी लेना नहीं भूलते।

 

थोड़ा बहुत रोजा

चार साल की उम्र है इब्राहिम अहमद की। अम्मा मिन्हा और वालिद इमरान की दैनिक गतिविधियां देखते हुए उन्होंने में दिन के कई बार के खाने में कटौती कर दी है। अम्मा के इसरार और मनुहार के बाद भी वे आम दिनों से कम ही खाने में रुचि दिखा रहे हैं। रोजा रख रहे हो क्या मियां... पूछने पर उनका जवाब होता है, हां रख रहा हूं, लेकिन थोड़ा बहुत ही...!

 

रोजे की निगरानी

पिता नौमान अहमद जब छुट्टी पर होते हैं, नन्हें हसनैन को भी मस्जिद ले जाते हैं। रमजान, रोजा, नमाज और सेहरी में उनकी बराबरी की शिरकत होती है। मस्जिद जाते हुए जब उनसे सवाल किया गया कि रोजा रखा है या नहीं...? अपनी तुतलाती जुबान से हसनैन का जवाब होता है, मस्जिद में रखा है, उसी को देखने के लिए मैं और अब्बा मस्जिद जा रहे हैं...!

दस्तरखान पर निगरानी 

बेबी फातिमा, छोटे नवाब फतेहयाब और छुटकी मरियम भी रमजान की गतिविधियों में शामिल हैं। रोजा रखने की न उनकी उम्र है, न ताकत और न अब्बा अम्मा से इजाजत। लेकिन हर शाम इफ्तार के दस्तरख्वान पर मौजूद होते हैं। खाने से ज्यादा अपने तरीके से फैला पसरी करना इनका शगल होता है। अक्सर सेहरी में जाग कर अम्मा के लिए परेशानियां खड़ी करना इनकी आदत में शुमार है।

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न्यूज़ सोर्स : Moin Khan