भोपाल। आसरा वृद्धाश्रम का शांत माहौल मानो किसी मौन पीड़ा का साक्षी बन गया था। भूख से तपता श्रमजीवी पिता जब मंच पर प्रवेश करता है, तो दर्शक सिर्फ एक पात्र को नहीं, बल्कि उस समाज को देखते हैं, जिसमें असमानता और संवेदनहीनता आज भी जीवित है। सेवन कलर्स कल्चरल एंड वेलफेयर सोसायटी की प्रस्तुति मुंशी प्रेमचंद की कालजयी कहानी 'सद्गति' उसी मौन को आवाज देती नजर आई। युवा रंगकर्मी अदनान खान के निर्देशन में मंचित यह नाटक एक ऐसे समाज का दर्पण था, जिसमें एक गरीब पिता अपनी बेटी के भविष्य के लिए सब कुछ सहता है। कहानी का नायक एक गरीब, श्रमजीवी और कई दिनों से भूखा व्यक्ति अपनी बेटी की सगाई के शुभमुहूर्त की आशा में पंडित के घर पहुंचता है।

मगर मुहूर्त निकालने के बदले उससे कठोर श्रम कराया जाता है। भूख, थकान और शारीरिक दुर्बलता उसे धीरे-धीरे तोड़ देती है। अंततः वह वहीं गिरकर प्राण त्याग देता है, उसी आंगन में जिसमें वह अपनी बेटी के कल्याण की उम्मीद लेकर आया था।

अंतिम दृश्य दर्शकों को यह सोचने पर विवश करता है कि क्या मनुष्य की पहचान अमीरी-गरीबी से तय होगी?

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न्यूज़ सोर्स : Moin Khan